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अध्यात्म का महत्त्व

by shikha@prashidigitech.com
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परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा निर्मित ‘गुरुकृपायोग’ यही बताता है  । इस मार्ग से की गई साधना से ईश्वरप्राप्ति शीघ्र की जा सकती है । इस माध्यम से अब तक (वर्ष २०२५ तक) १३२ साधक संत पद पर आरुढ हुए और १०४९ से अधिक साधक संत बनने के मार्ग पर हैं ।

इस संदर्भ में श्रीमद्भागवत्, वेद, श्रीमद्भगवद्गीता, उपनिषद इत्यादि धर्मग्रंथों में अनेक श्लोक हैं । वे आगे दिए अनुसार हैं ।

१. अनेक जन्मों के पश्चात मनुष्य का शरीर मिलता है इसलिए मनुष्य के जीवित रहने तक ही ईश्वरप्राप्ति संभव

लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः ।
तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु यावन्निःश्र्ेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ॥ – श्रीमद्भागवत, स्कन्ध ११, अध्याय ९, श्लोक २९

भावार्थ : अनेकों जन्मों के पश्चात ये अत्यंत दुर्लभ मनुष्य का शरीर प्राप्त हुआ है । यह शरीर इतना महान है कि इसके जीवित रहने तक ही पुरुषार्थ की प्राप्ति हो सकती है । मूलतः ‘यह शरीर नश्वर है’, इसलिए जब तक मृत्यु उसे गिलंकृत नहीं कर लेती, तब तक बुद्धिमान मनुष्य को सतर्कता और तत्परता से अपने परम कल्याण के लिए प्रयत्न करने चाहिए । इसका कारण यह है कि विषय भोग तो सभी योनियों में प्राप्त होने ही वाला है ।

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२. मनुष्यजन्म में ही परमात्वतत्त्व को समझने की जिज्ञासा रखें !

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः ।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ॥ – श्रीमद्भागवत, स्कंध २, अध्याय ९, श्लोक ३५

अर्थ : जो सदैव सभी स्थान पर व्याप्त है, वही आत्मतत्त्व है । जिज्ञासु मनुष्य यह तत्त्व ‘अन्वयव्यतिरेक’ (टिप्पणी) के माध्यम से समझ ले ।  -‘साप्ताहिक प्राजक्त’, धर्मयज्ञ, मार्च २०१८, स्वानुभव)

(टिप्पणी : अन्वय-व्यतिरेक न्याय दर्शन का एक तर्क-प्रकार है जिसका उपयोग कारण और कार्य के संबंध को सिद्ध करने के लिए किया जाता है । अन्वय का अर्थ है, जहां कारण होता है, वहां कार्य भी होता है, जैसे ‘‘जहां धुआं है, वहां आग है । वहीं व्यतिरेक का अर्थ है, जहां कारण नहीं होता, वहां कार्य भी नहीं होता, जैसे ‘‘जहां आग नहीं है, वहां धुआं नहीं है ।’’ इन दोनों विधियों के संयुक्त प्रयोग से हेतु और साध्य (कारण और कार्य) का संबंध निश्चित होता है ।)

३. गुरु के माध्यम से परमेश्वर को समझना, उनकी प्राप्ति करना, यही जीवन का लक्ष्य है, इसे समझ कर साधना करने से ‘ईश्वरप्राप्ति’ का ध्येय साध्य कर पाना

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ — कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, वाक्य १४

अर्थ : उठो, जागो, उत्तम पुरुषों के (गुरु के) सत्संग से परमेश्वर का स्वरूप समझ लो; इसलिए कि बुद्धिमान पुरुष कहते हैं कि (परमेश्वर को जानने का यह मार्ग तलवार की तेज धार पर चलने समान दुर्गम है ।
विवरण :  इस श्लोक से ध्यान में आता है कि परमेश्वर को समझना और उनकी प्राप्ति होना, यही जीवन का लक्ष्य है । इसके लिए गुरु के माध्यम से यह समझकर उसके अनुसार साधना करने से हम ईश्वरप्राप्ति का अपना ध्येय साध्य कर सकते हैं ।

४. यमराज द्वारा नचिकेत को बताना कि ‘सच्चिदानन्दघन परमात्मा को प्राप्त करना’, यही मानव का ध्येय है !

एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य ।
स मोदते मोदनीयं हि लब्ध्वा विवृतं सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ – कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली २, वाक्य १३

अर्थ :  इस धर्मतत्व का श्रवण कर, उसे योग्य प्रकार से ग्रहण कर, विचारपूर्वक इस सूक्ष्म आत्मतत्त्व को नश्वर मनुष्य समझ लेता है और आनंदस्वरूप परमात्मा की प्राप्ति कर वो आनंदमग्न हो जाता है । इस कारण हे नचिकेत ! मैं यह मानता हूं कि तुम्हारे लिए परमधाम के द्वार खुले हैं ।

विवरण : नचिकेत (संसार का प्रथम जिज्ञासु) जब यमराज के पास जाता है, तब यमराज भी नचिकेत को यही बताते हैं कि, ‘सच्चिदानंदघन (टिप्पणी) परमात्मा को प्राप्त करना, यही मानव का ध्येय है; कारण यह कि परमेश्वर में आनंद है । वे आनंदमय हैं । प्रत्येक जीव में उनका ही अस्तित्व है । इसीलिए मानव को लगता है कि उसे आनंद मिलता रहे; परंतु भ्रम के कारण प्रत्येक मानव आनंद को प्राप्त नहीं कर पाता । इसलिए गुरु की आवश्यकता है । वे ही योग्य मार्ग दिखानेवाले हैं ।

टिप्पणी : सच्चिदानंदघन : १. ‘सत्’ अर्थात ‘सत्य ।’ ‘चित्’ अर्थात ‘चैतन्य’ और ‘घन’ अर्थात ‘व्याप्त किया’ अथवा ‘व्याप्त ।’ ‘सच्चिदानंद’ अर्थात जो सत्य, चैतन्य और आनंद से व्याप्त है’, अर्थात ‘ईश्वर ।’

२. संस्कृत भाषा में ‘चित्’ का और भी एक अर्थ है – ‘ज्ञान’ और ‘घन’ शब्द का और भी एक अर्थ है – ‘मेघ’ अथवा ‘बादल ।’ इन अर्थों से ‘सच्चिदानंदघन’ अर्थात सत्य, ज्ञान और आनंद का मेघ’। इस अर्थ से यह विशेषण किसी सत्पुरुष के लिए प्रयोग किया जाता है ।

५. साधना कर परमात्मा में लीन होने के लिए ही मनुष्य का जन्म होना

मनसस्पत इमं नो दिवि देवेषु यज्ञम् ।

स्वाहा दिवि स्वाहा पृथिव्यां स्वाहान्तरिक्षे स्वाहा वाते धां स्वाहा ॥ – अथर्ववेद, काण्ड ७, सूक्त ९७, ऋचा ८

अर्थ : हे मननशील आत्मा और चित्त के स्वामी परमात्मा, मैंने देवताओं को अर्थात इंद्रियगणों के व्यापक यज्ञस्वरूप आत्मा को मोक्षपद में अर्पित कर दिया है । अब वह परम तेजोमय ब्रह्म में भली प्रकार आहुति देकर (अर्पण कर) उसमें लीन हो जाए, उस सर्वाधार महान ब्रह्म में वह लीन हो जाए; सर्वान्तर्यामी, सर्वव्यापक परब्रह्म में भी वह लीन होकर प्राणरूप सर्वाधार ईश्वर में वह आत्मा लीन हो जाए ।

उपरोक्त विवरण से यह ध्यान में आता है कि मनुष्य का जन्म साधना कर ईश्वरप्राप्ति के लिए हुआ है । ईश्वर से निर्माण हुआ मानव जीव का जन्म साधना कर उसी में विलीन होने के लिए हुआ है ।’ ।

६. पिछले अनेक जन्मों के संस्कारों के बल पर प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाले योगी द्वारा इसी जन्म में सिद्धि प्राप्त कर सभी पापों से मुक्त होकर तत्काल परम गति को प्राप्त होना

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥ — श्र्ीमद्भगवद्गीता, अध्याय ६, श्लोक ४५

अर्थ : प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी पिछले अनेक जन्मों के संस्कारों के बल पर इसी जन्म में पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर सभी पापों से मुक्त होता है और तत्काल परम गति को प्राप्त होता है ।

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